हिमाचल प्रदेश का मौजूदा वित्तीय संकट अब केवल प्रशासनिक फाइलों और सचिवालय की बैठकों तक सीमित नहीं रहा है, बल्कि इसने राज्य की स्वास्थ्य प्रणाली पर सीधा और विनाशकारी प्रहार किया है। विशेष रूप से, केंद्र की आयुष्मान भारत और राज्य की अपनी महत्वाकांक्षी हिमकेयर (Himcare) योजना के तहत मुफ्त इलाज का वादा अब बिखर रहा है। जमीनी हकीकत यह है कि राज्य सरकार इन स्वास्थ्य योजनाओं के लिए अपना अनिवार्य हिस्सा देने में विफल रही है, जिससे अस्पतालों की देनदारी 770 करोड़ रुपये के पार पहुंच गई है। वित्तीय कुप्रबंधन का आलम यह है कि आयुष्मान भारत में राज्य का 40% हिस्सा लंबे समय से लंबित है, जबकि हिमकेयर के 400 करोड़ रुपये के बिल बकाया हैं, जिससे पूरा चिकित्सा ढांचा कर्ज के बोझ तले दब गया है।
इस विफलता का सबसे दर्दनाक पहलू उन गरीब मरीजों की दुर्दशा है, जो मुफ्त इलाज के भरोसे सरकारी अस्पतालों में आते हैं। कुल्लू, बिलासपुर और शिमला जैसे जिलों से आने वाले कैंसर और अन्य गंभीर बीमारियों के मरीज निजी मेडिकल स्टोर से महंगे इंजेक्शन और दवाएं खरीदने को मजबूर हैं। जीवन रक्षक कीमोथेरेपी इंजेक्शन, जो मुफ्त मिलने चाहिए थे, अब ‘स्टॉक खत्म’ होने के बहाने मरीजों को खुद खरीदने पड़ रहे हैं। बिलासपुर के एक मरीज के परिजनों के अनुसार, हिमकेयर कार्ड केवल बुनियादी दवाओं तक सीमित रह गया है; 9,000 रुपये के इंजेक्शन और 2,400 रुपये के टेस्ट के लिए उन्हें निजी लैब का रुख करना पड़ रहा है। प्रधानमंत्री और राज्य सरकार के दावों के विपरीत, मुफ्त इलाज अब एक कल्पना मात्र रह गया है।
इस ढहते बुनियादी ढांचे का मुख्य कारण वह भारी कर्ज है जिसे सरकार चुका नहीं पा रही है। आधिकारिक आंकड़े बताते हैं कि हिमकेयर के तहत 400 करोड़, आयुष्मान भारत के 250 करोड़ और सहारा योजना के 120 करोड़ रुपये बकाया हैं। भुगतान में इस देरी ने एक ‘चेन रिएक्शन’ शुरू कर दिया है: सर्जिकल सामान और उपकरणों की आपूर्ति करने वाले निजी वेंडरों ने अपनी सेवाएं वापस ले ली हैं। कई वेंडरों ने स्पष्ट कर दिया है कि पुराने बिलों के भुगतान तक वे नई सप्लाई नहीं देंगे। नतीजतन, कई अस्पतालों में जटिल ऑपरेशन अनिश्चित काल के लिए टल रहे हैं, जिससे मरीजों की जान जोखिम में है।
स्वास्थ्य मंत्री कर्नल धनीराम शांडिल का तर्क है कि अतीत में बिना सोचे-समझे कार्ड जारी करने से आर्थिक दबाव बढ़ा है, जिसके समाधान के रूप में अब पंजीकरण को साल में केवल दो बार सीमित कर दिया गया है। हालांकि, यह कदम केवल एक प्रशासनिक ‘बैंड-एड’ की तरह है। दिलचस्प बात यह है कि वित्त सचिव देवेश कुमार ने अर्थव्यवस्था को स्थिर करने के लिए इन योजनाओं को बंद करने तक का सुझाव दिया था। हालांकि मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू ने इसे खारिज कर दिया, लेकिन फंड की कमी ने इन योजनाओं को ‘वेंटिलेटर’ पर ला खड़ा किया है।
डॉक्टर और अस्पताल प्रशासन संसाधनों के अभाव में अग्रिम मोर्चे पर संघर्ष कर रहे हैं। मनजीत सहगल की रिपोर्ट और स्थानीय मीडिया कवरेज स्पष्ट करती है कि जब तक सरकार केंद्र के साथ समन्वय कर इस 770 करोड़ की देनदारी को नहीं सुलझाती, तब तक ‘मुफ्त स्वास्थ्य सेवा’ केवल एक राजनीतिक नारा बनी रहेगी। वर्तमान में लाभ केवल टुकड़ों में मिल रहा है, और यदि यही स्थिति रही, तो निजी अस्पताल फलेंगे-फूलेंगे जबकि गरीब कर्ज के जाल में फंसता जाएगा।








