हरियाणा में बिजली कर्मचारियों द्वारा बुलाई गई दो-दिवसीय हड़ताल ने महज 48 घंटों के भीतर राज्य सरकार को बैकफुट पर लाने के लिए मजबूर कर दिया। इस आंदोलन ने प्रशासनिक व्यवस्था और नीतिगत फैसलों की पोल खोलकर रख दी, जिससे यह साफ हो गया कि जनहित और बुनियादी ढांचे से जुड़े मुद्दों पर जनता और कर्मचारियों का दबाव सरकार के लिए कितना भारी पड़ सकता है।
इस पूरे घटनाक्रम की शुरुआत हरियाणा विद्युत विनियामक आयोग (HERC) के उस फैसले से हुई, जिसमें गुरुग्राम और नूंह के लिए एक निजी कंपनी को 25 साल का समानांतर बिजली वितरण लाइसेंस दिया गया था। सरकार इसे एक स्वतंत्र विनियामक निकाय का फैसला बताकर पल्ला झाड़ने की कोशिश कर रही थी, लेकिन लगभग 40,000 बिजली कर्मचारियों और इंजीनियरों ने इसे सार्वजनिक क्षेत्र के ढांचे में ‘पिछले दरवाजे से निजीकरण’ की एंट्री मानकर आर-पार की लड़ाई का ऐलान कर दिया।
ठप हुआ जनजीवन और सड़कों पर उतरी जनता
जब हड़ताल के कारण आवश्यक रखरखाव और तकनीकी स्टाफ ने काम बंद किया, तो गुरुग्राम, फरीदाबाद और नूंह जैसे प्रमुख औद्योगिक और शहरी केंद्र गहरे संकट में घिर गए। दर्जनों इलाकों में 16 घंटे से अधिक समय तक बिजली गुल रही, इनवर्टर जवाब दे गए और बिजली के अभाव में वाटर सप्लाई पंप बंद होने से नल सूख गए। बुनियादी सुविधाओं के चरमराने से गुस्साए लोग सड़कों पर उतर आए और जगह-जगह विरोध प्रदर्शन शुरू हो गए, जबकि औद्योगिक इकाइयों का उत्पादन ठप होने से आर्थिक नुकसान भी अलग हुआ। इस जन-आक्रोश ने सरकार की प्रशासनिक मशीनरी को पूरी तरह हिला कर रख दिया और विपक्ष ने भी सरकार को कॉर्पोरेट समर्थक ठहराते हुए चौतरफा घेर लिया।
सरकार का डिफेंस और हड़ताल की समाप्ति
एक तरफ जनता का बढ़ता गुस्सा और दूसरी तरफ राज्य के बिजली ढांचे के ठप होने के खतरे ने मिलकर सरकार को यह अहसास करा दिया कि यदि इस पर तुरंत कदम नहीं उठाए गए, तो राजनीतिक नुकसान बहुत बड़ा होगा। स्थिति की नज़ाकत को भांपते हुए मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी और ऊर्जा मंत्री अनिल विज को तुरंत दखल देना पड़ा और सरकार ने लचीला रुख अपनाते हुए HERC के फैसले के खिलाफ कानूनी कदम उठाने और लाइसेंस के फैसले पर पुनर्विचार करने का भरोसा दिया, जिसके बाद यूनियनों ने हड़ताल वापस ले ली। यह पूरा घटनाक्रम यह सिखाता है कि जब नीतिगत फैसले जमीन की वास्तविकताओं और जन-भावनाओं को दरकिनार करके लिए जाते हैं, तो किस तरह एक मजबूत श्रम शक्ति और जनता का आक्रोश मिलकर सरकार को बड़े से बड़े फैसले पलटने पर मजबूर कर देता है।
