प्यारी बहना योजना पर कांग्रेस घिरी, ज्यादातर आवेदक अभी भी कतार में

Pyari Bahna scheme himachal

हिमाचल प्रदेश की इंदिरा गांधी प्यारी बहना सुख-सम्मान निधि योजना के धीमे क्रियान्वयन पर विपक्ष ने कांग्रेस सरकार को घेर लिया है। सरकार ने अब तक सालाना बजट के 800 करोड़ रुपये में से सिर्फ 29.12 करोड़ रुपये ही खर्च किए हैं। 5 लाख से ज्यादा महिलाओं के खातों में हर महीने 1,500 रुपये डालने की योजना के लिए यह रकम वादा किए गए हिस्से का बहुत छोटा हिस्सा है।

राज्य भर में जमा 7.88 लाख आवेदनों में से सिर्फ 37.29 प्रतिशत—करीब 2,93,881 महिलाएं—ही पैसा पा रही हैं। इनमें 48,000 नई स्वीकृत लाभार्थी और 2,45,881 ऐसी महिलाएं शामिल हैं जिनकी पुरानी पेंशन को 1,500 रुपये तक बढ़ा दिया गया है। बाकी 62.71 प्रतिशत, यानी करीब 4,94,119 आवेदक अभी भी इंतजार की सूची में हैं। इनमें से 2.5 लाख महिलाओं को पहले से सत्यापित कर अगले चक्र के लिए फास्ट-ट्रैक किया गया है, जबकि बाकी 2,44,119 फाइलें अभी ई-केवाईसी और भूमि-सत्यापन की प्रक्रिया से गुजर रही हैं।

यह योजना राज्य के सभी 12 जिलों में चल रही है। इसकी शुरुआत लाहौल-स्पीति के आदिवासी जिले में पायलट प्रोजेक्ट के रूप में हुई थी, जहां ऊंचाई वाले इलाकों में सर्दियों में इसे शुरू किया गया। इसके बाद चरणबद्ध तरीके से चंबा के पांगी घाटी, शिमला के डोडरा क्वार और कुपवी, तथा कुल्लू के बंजार ब्लॉक जैसे इलाकों तक पहुंची। विधायी मंजूरी और फंडिंग प्लान पूरे राज्य को कवर करता है। अब इसे किन्नौर तक बढ़ाया जा रहा है और विधवा परिवारों की पात्र बेटियों व बहुओं को भी शामिल करने की तैयारी है।

मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू ने इस धीमी गति का बचाव किया है। उन्होंने कहा, “इस ऐतिहासिक पहल का हमारा लक्ष्य महिलाओं की सामाजिक-आर्थिक स्थिति को ऊपर उठाना और उन्हें आर्थिक स्वतंत्रता व सम्मान देना है। हम अपने चुनावी वादों को व्यवस्थित तरीके से पूरा कर रहे हैं और यह योजना हर पात्र महिला तक पारदर्शी तरीके से पहुंचेगी।”

पात्रता के नियम सख्त हैं। परिवार की सालाना आय 2 लाख रुपये से ज्यादा नहीं होनी चाहिए। अगर महिला या उनके परिवार का कोई सदस्य इनकम टैक्स भरता है, जीएसटी में पंजीकृत है, या नियमित, कॉन्ट्रैक्ट या आउटसोर्स सरकारी नौकरी करता है, तो वे बाहर हो जाते हैं। स्थानीय निकाय कर्मचारी, सैन्य कर्मी और आंगनवाड़ी, आशा तथा मिड-डे मील वर्कर जैसी मानदेय कर्मचारी भी बाहर हैं। स्थानीय मठों में स्थायी रूप से रहने वाली बौद्ध ननें पात्र बनी हुई हैं।

भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष डॉ. राजीव बिंदल ने इसे निराशाजनक बताया। उन्होंने कहा, “यह वित्तीय सहायता इंतजार का खेल बन गई है और लाखों महिलाओं को अंतहीन शर्तों से गुजारना पूरी तरह निराशाजनक है। सरकार सिर्फ जनता की उम्मीदों को मैनेज करने की कोशिश कर रही है, जबकि चुनाव पूर्व वादों को साफ-सुथरे तरीके से पूरा करने में नाकाम है।”

आवेदन अभी भी कागज पर ही जमा होते हैं। महिलाएं अपना आधार कार्ड और आय प्रमाण पत्र लेकर स्थानीय तहसील कल्याण कार्यालय पहुंचती हैं और सत्यापन पूरा होने का इंतजार करती हैं।

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